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| 020 |
_a9780143421054 _qPaperback |
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| 040 |
_aNISER LIBRARY _beng _cNISER LIBRARY |
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| 082 |
_a82-31 _bFAR-K |
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| 100 | _aफ़ारुक़ी, शम्सुर्रहमान | ||
| 245 | _aकई चांद थे सरे-आसमां | ||
| 260 |
_aहरियाणा : _bपेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया प्रा. लि., _c2024. |
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| 300 |
_a748 pages ; _c22 cm |
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| 520 | _a'कई चांद थे सरे-आसमां इक्कीसवीं सदी की ही नहीं, उर्दू फिक्शन की बेहतरीन किताब है-असलम फर्रूखी 18वीं सदी के राजपूताने से शुरू होने वाली और एक सदी से कुछ ज्यादा समय बाद दिल्ली के लाल किले में ख़त्म होने वाली यह दास्तान हिंदुस्तानी फनकार की रूह की गहराइयों में उतरने की कोशिश करने के अलावा हिंद-इस्लामी तहजीब, साहित्यिक समाज, अंग्रेज़ी सियासत और उसकी वजह से तहज़ीब और तारीख के बदलते हुए चेहरे हमारे सामने पेश करती है। यह उपन्यास हमें ये भी बताता है कि 18वी और 19वीं सदी के हिंद-इस्लामी समाज में शायर, आशिक, फनकार और आम इन्सान, जिंदगी और जज़्बाती और रूहानी तौर पर मुकम्मल होने की तलाश किस तरह और किन उसूलों के आधार पर करते थे। देहली की मिटती हुई बादशाहत के साए में फलने-फूलने वाली इस तहज़ीब का मंज़रनामा गालिब, जौक, दाग, घनश्याम लाल आसी, इमामबख्श सहबाई, हकीम अहसनुल्लाह खां के साथ-साथ बहादुरशाह ज़फ़र, मलिका जीनतमहल और नवाब शम्सुद्दीन अहमद खां जैसे बहुत से वास्तविक किरदारों से भी जगमगा रहा है। इस उपन्यास को उस सदी की हिंद-इस्लामी तहज़ीब में कौमी एकजुटता, जिंदगी, मुहब्बत और फ़न की तलाश की दास्तान कहें तो सही होगा। | ||
| 650 | _aHistorical fiction, Urdu Translations into Hindi | ||
| 856 |
_3Reviews _uhttps://www.goodreads.com/book/show/30593906---kai-chand-the-sar-e-aasman#CommunityReviews |
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