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_a9789350486085 _qPaperback |
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_a2-584 _bVIV-R |
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| 100 | _aस्वामी विवेकानंद | ||
| 245 | _aराजयोग | ||
| 260 |
_aनई दिल्ली : _bप्रभात प्रकाशन प्रा. लि., _c2025. |
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| 300 |
_a199 pages ; _c20 cm. |
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| 520 | _aराजयोग-विद्या इस सत्य को प्राप्त करने के लिए, मानव के समक्ष यथार्थ, व्यावहारिक और साधनोपयोगी वैज्ञानिक प्रणाली रखने का प्रस्ताव करती है। पहले तो प्रत्येक विद्या के अनुसंधान और साधन की प्रणाली पृथक्-पृथक् है। यदि तुम खगोलशास्त्री होने की इच्छा करो और बैठे-बैठे केवल ‘खगोलशास्त्र खगोलशास्त्र’ कहकर चिल्लाते रहो, तो तुम कभी खगोलशास्त्र के अधिकारी न हो सकोगे। रसायनशास्त्र के संबंध में भी ऐसा ही है; उसमें भी एक निर्दिष्ट प्रणाली का अनुसरण करना होगा; प्रयोगशाला में जाकर विभिन्न द्रव्यादि लेने होंगे, उनको एकत्र करना होगा, उन्हें उचित अनुपात में मिलाना होगा, फिर उनको लेकर उनकी परीक्षा करनी होगी, तब कहीं तुम रसायनविज्ञ हो सकोगे। यदि तुम खगोलशास्त्रज्ञ होना चाहते हो, तो तुम्हें वेधश | ||
| 650 | _aSpirituality | ||
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_aHinduism _xPhilosophy |
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_3Reviews _uhttps://www.goodreads.com/book/show/27388389-rajyoga?ref=nav_sb_ss_1_13#CommunityReviews |
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