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| 020 |
_a9788171789634 _qPaperback |
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| 040 |
_aNISER LIBRARY _beng _cNISER LIBRARY |
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| 082 |
_a82-1 _bSHA-P |
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| 245 |
_aप्रतिनिधि कविताएँ : _bरघुवीर सहाय |
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| 260 |
_aनई दिल्ली : _bराजकमल प्रकाशन प्रा. लि., _c2023. |
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| 300 | _a162 pages | ||
| 520 | _a‘आज़ादी’ मिली। देश में 'लोकतंत्र’ आया। लेकिन इस लोकतंत्र के पिछले पाँच दशकों में उसका सर्जन करनेवाले मतदाता का जीवन लगभग असम्भव हो गया। रघुवीर सहाय भारतीय लोकतंत्र की विसंगतियों के बीच मरते हुए इसी बहुसंख्यक मतदाता के प्रतिनिधि कवि हैं, और इस मतदाता की जीवन-स्थितियों की ख़बर देनेवाली कविताएँ उनकी प्रतिनिधि कविताएँ हैं। रघुवीर सहाय का ऐतिहासिक योगदान यह भी है कि उन्होंने कविता के लिए सर्वथा नए विषय-क्षेत्रों की तलाश की और उसे नई भाषा में लिखा। इन कविताओं को पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि उन्होंने ऐसे ठिकानों पर काव्यवस्तु देखी है जो दूसरे कवियों के लिए सपाट और निरा गद्यमय हो सकती है। इस तरह उन्होंने जटिल होते हुए कवि-कर्म को सरल बनाया। परिणाम हुआ कि आज के नए कवियों ने उनके रास्ते पर सबसे अधिक चलने की कोशिश की। रघुवीर सहाय की कविताओं से गुजरना देश के उन दूरदराज़ इलाक़ों से गुज़रना है जहाँ आदमी से एक दर्जा नीचे का समाज असंगठित राजनीति का अभिशाप झेल रहा है। | ||
| 600 |
_aSahai, Raghuvir, _d(1929–1990) |
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| 650 |
_aHindi poetry _y20th century |
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| 655 | _aPoems | ||
| 700 |
_aशर्मा, सुरेश _eeditor _6880-02 |
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| 856 |
_3Reviews _uhttps://www.goodreads.com/book/show/26001566?ref=nav_sb_ss_1_13#CommunityReviews |
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| 942 |
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