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| 020 |
_a9788126706044 _qPaperback |
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| 040 |
_aNISER LIBRARY _beng _cNISER LIBRARY |
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| 082 |
_a82-1 _bSIN-P |
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| 245 |
_aप्रतिनिधि कविताएँ : _bनागार्जुन |
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| 260 |
_aनई दिल्ली : _bराजकमल प्रकाशन प्रा. लि., _c2025. |
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| 300 | _a144 pages | ||
| 520 | _aहिन्दी के आधुनिक कौर नागार्जुन की कविता के बारे में डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है : " जहाँ मौत नहीं है, बुढ़ापानहीं है, जनता के असन्तोष और राज्यसभाई जीवन का सन्तुलन नहीं है, वह कविता है नागार्जुन की। ढाई पसली के घुमन्तू जीव, दमे के मरीज़, गृहस्थी का भार-फिर भी क्र्या ताक़त है नागार्जुन की कविताओं में! और कवियों में जहाँ छायावादी कल्पनाशीलता प्रबल हुई है, नागार्जुन की छायावादी काव्य-शैली कभी की ख़त्म हो चुकी है। अन्य कवियों में रहस्यवाद और यथार्थवाद को लेकर द्वन्द्व हुआ है, नागार्जुन का व्यंग्य और पैना हुआ है, क्रान्तिकारी आस्था और दृढ़ हुई है, उनके यथार्थ चित्रण में अधिक विविधता और प्रौढ़ता आई है। ... उनकी कविताएँ लोक-संस्कृति के इतना नजदीक हैं कि उसी का एक विकसित रूप मालूम होती हैं। किन्तु वे लोकगीतों से भिन्न हैं, सबसे पहले अपनी भाषा-खड़ी बोली के कारण, उसके बाद अपनी प्रखर राजनीतिक चेतना के कारण, और अन्त में बोलचाल की भाषा की गति और लय को आधार मानकर नए-नए प्रयोगों के कारण। हिन्दीभाषी... किसान और मज़दूर जिस तरह की भाषा... समझते और बोलते हैं, उसका निखरा हुआ काव्यमय रूप नागार्जुन के यहाँ है।" | ||
| 600 |
_aNagarjun _q(Vaidyanath Mishra), _d(1911–1998) |
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| 650 |
_aHindi poetry _y20th century |
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| 655 | _aPoems | ||
| 700 |
_aसिंह, नामवर _eeditor _6880-02 |
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