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प्रतिनिधि कविताएँ : नागार्जुन

Contributor(s): Publication details: नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., 2025.Description: 144 pagesISBN:
  • 9788126706044
Subject(s): Genre/Form: DDC classification:
  • 82-1 SIN-P
Online resources: Summary: हिन्दी के आधुनिक कौर नागार्जुन की कविता के बारे में डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है : " जहाँ मौत नहीं है, बुढ़ापानहीं है, जनता के असन्तोष और राज्यसभाई जीवन का सन्तुलन नहीं है, वह कविता है नागार्जुन की। ढाई पसली के घुमन्तू जीव, दमे के मरीज़, गृहस्थी का भार-फिर भी क्र्या ताक़त है नागार्जुन की कविताओं में! और कवियों में जहाँ छायावादी कल्पनाशीलता प्रबल हुई है, नागार्जुन की छायावादी काव्य-शैली कभी की ख़त्म हो चुकी है। अन्य कवियों में रहस्यवाद और यथार्थवाद को लेकर द्वन्द्व हुआ है, नागार्जुन का व्यंग्य और पैना हुआ है, क्रान्तिकारी आस्था और दृढ़ हुई है, उनके यथार्थ चित्रण में अधिक विविधता और प्रौढ़ता आई है। ... उनकी कविताएँ लोक-संस्कृति के इतना नजदीक हैं कि उसी का एक विकसित रूप मालूम होती हैं। किन्तु वे लोकगीतों से भिन्न हैं, सबसे पहले अपनी भाषा-खड़ी बोली के कारण, उसके बाद अपनी प्रखर राजनीतिक चेतना के कारण, और अन्त में बोलचाल की भाषा की गति और लय को आधार मानकर नए-नए प्रयोगों के कारण। हिन्दीभाषी... किसान और मज़दूर जिस तरह की भाषा... समझते और बोलते हैं, उसका निखरा हुआ काव्यमय रूप नागार्जुन के यहाँ है।"
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Item type Current library Call number Status Barcode
Hindi Collection Hindi Collection NISER LIBRARY 1st Floor - Hindi Collection 82-1 SIN-P (Browse shelf(Opens below)) Available 26164

हिन्दी के आधुनिक कौर नागार्जुन की कविता के बारे में डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है : " जहाँ मौत नहीं है, बुढ़ापानहीं है, जनता के असन्तोष और राज्यसभाई जीवन का सन्तुलन नहीं है, वह कविता है नागार्जुन की। ढाई पसली के घुमन्तू जीव, दमे के मरीज़, गृहस्थी का भार-फिर भी क्र्या ताक़त है नागार्जुन की कविताओं में! और कवियों में जहाँ छायावादी कल्पनाशीलता प्रबल हुई है, नागार्जुन की छायावादी काव्य-शैली कभी की ख़त्म हो चुकी है। अन्य कवियों में रहस्यवाद और यथार्थवाद को लेकर द्वन्द्व हुआ है, नागार्जुन का व्यंग्य और पैना हुआ है, क्रान्तिकारी आस्था और दृढ़ हुई है, उनके यथार्थ चित्रण में अधिक विविधता और प्रौढ़ता आई है। ... उनकी कविताएँ लोक-संस्कृति के इतना नजदीक हैं कि उसी का एक विकसित रूप मालूम होती हैं। किन्तु वे लोकगीतों से भिन्न हैं, सबसे पहले अपनी भाषा-खड़ी बोली के कारण, उसके बाद अपनी प्रखर राजनीतिक चेतना के कारण, और अन्त में बोलचाल की भाषा की गति और लय को आधार मानकर नए-नए प्रयोगों के कारण। हिन्दीभाषी... किसान और मज़दूर जिस तरह की भाषा... समझते और बोलते हैं, उसका निखरा हुआ काव्यमय रूप नागार्जुन के यहाँ है।"

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