ज्ञानयोग
Publication details: नई दिल्ली : प्रभात प्रकाशन प्रा. लि., 2025.Description: 232 pages ; 20 cmISBN:- 9789350486092
- 2-584 VIV-G
| Item type | Current library | Call number | Status | Barcode | |
|---|---|---|---|---|---|
Hindi Collection
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NISER LIBRARY 1st Floor - Hindi Collection | 2-584 VIV-G (Browse shelf(Opens below)) | Available | 26186 |
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| 172 SAP-K काम की प्रशंसा में | 24 BHA-Y युवाओं के लिए बुद्ध | 2-584 VIV-B भक्तियोग | 2-584 VIV-G ज्ञानयोग | 2-584 VIV-K कर्मयोग | 2-584 VIV-P प्रेमयोग | 2-584 VIV-R राजयोग |
मानव-जाति के भाग-निर्माण में जितनी शक्तियों ने योगदान दिया है और दे रही हैं, उन सब में धर्म के रूप में प्रगट होनेवाली शक्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण कोई नहीं है। सभी सामाजिक संगठनों के मूल में कहीं-न-कहीं यही अद्भुत शक्ति काम करती रही है तथा अब तक मानवता की विविध इकाइयों को संगठित करनेवाली सर्वश्रेष्ठ प्रेरणा इसी शक्ति से प्राप्त हुई है। हम सभी जानते हैं कि धार्मिक एकता का संबंध प्रायः जातिगत, जलवायुगत तथा वंशानुगत एकता के संबंधों से भी दृढ़तर सिद्ध होता है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि एक ईश्वर को पूजनेवाले तथा एक धर्म में विश्वास करनेवाले लोग जिस दृढ़ता और शक्ति से एक-दूसरे का साथ देते हैं, वह एक ही वंश के लोगों की बात ही क्या, भाई-भाई में भी देखने को नहीं मिलता। धर्म के प्रादुर्भाव को समझने के लिए अनेक प्रयास किए गए हैं। अब तक हमें जितने प्राचीन धर्मों का ज्ञान है, वे सब एक यह दावा करते हैं कि वे सभी अलौकिक हैं, मानो उनका उद्भव मानव-मस्तिष्क से नहीं बल्कि उस स्रोत से हुआ है, जो उसके बाहर है।
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