भक्तियोग
Publication details: नई दिल्ली : प्रभात प्रकाशन प्रा. लि., 2025.Description: 134 pagesISBN:- 9789350486078
- 2-584 VIV-B
| Item type | Current library | Call number | Status | Date due | Barcode | |
|---|---|---|---|---|---|---|
Hindi Collection
|
NISER LIBRARY 1st Floor - Hindi Collection | 2-584 VIV-B (Browse shelf(Opens below)) | Checked out to SANDEEPA SAHOO (0126) | 20/03/2026 | 26182 |
Browsing NISER LIBRARY shelves, Shelving location: 1st Floor - Hindi Collection Close shelf browser (Hides shelf browser)
| 159.923.2 MAR-J जहा चाह वहा राह | 172 SAP-K काम की प्रशंसा में | 24 BHA-Y युवाओं के लिए बुद्ध | 2-584 VIV-B भक्तियोग | 2-584 VIV-G ज्ञानयोग | 2-584 VIV-K कर्मयोग | 2-584 VIV-P प्रेमयोग |
निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज को ‘भक्तियोग’ कहते हैं। इस खोज का आरंभ, मध्य और अंत प्रेम में होता है। ईश्वर के प्रति एक क्षण की भी प्रेमोन्मत्तता हमारे लिए शाश्वत मुक्ति को देनेवाली होती है। ‘भक्तिसूत्र’ में नारदजी कहते हैं, ‘‘भगवान्् के प्रति उत्कट प्रेम ही भक्ति है। जब मनुष्य इसे प्राप्त कर लेता है, तो सभी उसके प्रेमपात्र बन जाते हैं। वह किसी से घृणा नहीं करता; वह सदा के लिए संतुष्ट हो जाता है। इस प्रेम से किसी काम्य वस्तु की प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जब तक सांसारिक वासनाएँ घर किए रहती हैं, तब तक इस प्रेम का उदय ही नहीं होता। भक्ति कर्म से श्रेष्ठ है और ज्ञान तथा योग से भी उच्च है, क्योंकि इन सबका एक न एक लक्ष्य है ही, पर भक्ति स्वयं ही साध्य और साधन-स्वरूप है।’’
There are no comments on this title.